लोकतंत्र का नया व्याकरण: जब सवाल देशद्रोह और चुप्पी अंधभक्ति बन जाए

 लोकतंत्र का नया व्याकरण: जब सवाल देशद्रोह और चुप्पी अंधभक्ति बन जाए

सृष्टि न्यूज झारखण्ड :- भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप को अगर एक कैनवास पर उतारा जाए, तो तस्वीर कुछ धुंधली और अजीबोगरीब नज़र आती है। समाज के हर स्तंभ का काम बदल गया है। जो तर्क देते थे, वे सलाखों के पीछे हैं और जो प्रवचन देते थे, वे नीति निर्धारण कर रहे हैं। आज का भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ विरोधाभास ही नया सामान्य बन चुका है।

बाबाओं का ज्ञान और शिक्षकों का संघर्ष

समाज की पहली विडंबना यह है कि आज ज्ञान की परिभाषा बदल गई है। जिन शिक्षकों और प्रोफेसरों का काम देश की नई पीढ़ी का बौद्धिक निर्माण करना था, वे अपनी जायज मांगों के लिए सड़कों पर लाठियां खा रहे हैं। चाहे वह मानदेय का मामला हो या पुरानी पेंशन योजना, कलम थामने वाले हाथ आज अपनी गरिमा बचाने के लिए संघर्षरत हैं। दूसरी ओर, तथाकथित 'बाबा' और स्वयंभू आध्यात्मिक गुरु टीवी चैनलों से लेकर बड़े मंचों तक राजनीतिक और सामाजिक ज्ञान बांट रहे हैं। विज्ञान और तर्क की जगह अंधविश्वास को 'दिव्य ज्ञान' के पैकेट में बेचा जा रहा है।


सत्ता का नया मंदिर और भक्ति की राजनीति

भारतीय राजनीति में अब नीतियों की चर्चा कम और पूजा-पाठ के दृश्य अधिक दिखाई देते हैं। जो नेता संसद में जनता के सवालों का जवाब देने के लिए चुने गए थे, वे धार्मिक अनुष्ठानों के मुख्य यजमान बने नजर आते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं कि व्यक्ति आस्तिक हो, लेकिन समस्या तब होती है जब 'पूजा करने वाले' प्रशासन चलाने की वैज्ञानिक दृष्टि को दरकिनार कर देते हैं। धर्म और राजनीति का यह मेल लोकतंत्र की उस बुनियादी सोच को चुनौती दे रहा है जहाँ राज्य का कोई धर्म नहीं होना चाहिए था।


संस्थाओं का मौन और प्रवक्ता की भूमिका

आज के दौर की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि संवैधानिक संस्थाएं अपनी स्वायत्तता खोती दिख रही हैं। जब चुनाव आयोग जैसे स्वतंत्र निकाय से सवाल पूछा जाता है, तो जवाब चुनाव आयोग की जगह सत्ताधारी दल की ओर से आता है। और जब जनता सत्ताधारी दल से जवाब मांगती है, तो देश का मुख्यधारा मीडिया (Mainstream Media) एक वकील की तरह बचाव में उतर आता है। मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, आज सत्ता के रक्षक के रूप में खड़ा है। सवाल पूछने वालों का चरित्र हनन करना अब पत्रकारिता का नया मापदंड बन गया है।


वैज्ञानिक जेल में, बलात्कारी बेल पर

न्याय व्यवस्था के आइने में देखें तो तस्वीर और भी डरावनी है। समाज के लिए लड़ने वाली महिला कार्यकर्ताएं और मानवता की रक्षा का संकल्प लेने वाले वैज्ञानिक महीनों तक बिना ट्रायल के जेल में बंद रहते हैं। उन्हें 'सिस्टम' के लिए खतरा माना जाता है। वहीं दूसरी ओर, जघन्य अपराधों के दोषी और बलात्कारी चुनाव के समय 'पैरोल' पर बाहर आते हैं, उनका स्वागत फूलों की मालाओं से किया जाता है। क्या यह एक सभ्य समाज की पहचान है? जब रक्षक ही भक्षक का सम्मान करने लगें, तो न्याय की उम्मीद दम तोड़ने लगती है।


शिक्षा और सत्ता का विरोधाभास

देश की एक और कड़वी सच्चाई यह है कि आज योग्यता का पैमाना बदल गया है। सालों तक पढ़ाई करने वाले, डिग्रियां हासिल करने वाले युवा एक अदद नौकरी के लिए चप्पलें घिस रहे हैं। वे सिस्टम के भीतर एक छोटी सी 'फाइल' बनकर रह गए हैं। वहीं, शिक्षा की बुनियादी कसौटी पर फेल होने वाले लोग देश की नीति और भविष्य तय कर रहे हैं। अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोगों का सत्ता में होना लोकतंत्र की खूबसूरती हो सकती थी, अगर उनमें विशेषज्ञों की बात सुनने की समझ होती। लेकिन यहाँ विशेषज्ञता को 'हार्ड वर्क' के आगे कमतर आंका जाता है।


देशद्रोही और अंधभक्त के बीच फंसा नागरिक

आज के समाज को दो स्पष्ट धड़ों में बांट दिया गया है। अगर आप सरकार की किसी गलत नीति पर सवाल उठाते हैं, या बेरोजगारी और महंगाई पर बात करते हैं, तो आपको तुरंत 'देशद्रोही' या 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' का तमगा दे दिया जाता है। वहीं, जो लोग आँखों पर पट्टी बांधकर हर गलत को सही ठहराते हैं और व्यवस्था की आरती उतारते हैं, उन्हें 'अंधभक्त' कहकर पुकारा जाता है। बीच का रास्ता, जहाँ तर्क और संवाद की जगह थी, वह पूरी तरह खत्म हो गया है।


निष्कर्ष: चुप्पी का परिणाम

इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज का बौद्धिक वर्ग चुप रहा है, तब-तब सभ्यताओं का पतन हुआ है। आज अगर बाबा ज्ञान दे रहे हैं और शिक्षक मार खा रहे हैं, तो इसका मतलब है कि समाज की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। हमें यह सोचना होगा कि हम अपने बच्चों को कैसा भविष्य दे रहे हैं—एक ऐसा भविष्य जहाँ सवाल पूछना अपराध हो, या ऐसा जहाँ शिक्षा और तर्क का सम्मान हो?


लोकतंत्र सिर्फ वोट देने का नाम नहीं है, बल्कि यह निरंतर सवाल पूछने की प्रक्रिया है। जिस दिन सवाल मर जाते हैं, उस दिन लोकतंत्र सिर्फ एक ढांचा बनकर रह जाता है, जिसके भीतर तानाशाही की आत्मा निवास करने लगती है।

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