बेटियों ने तोड़ी रूढ़ियां: गुमला की पांच बहनों ने मां की अर्थी को दिया कंधा, बड़ी बेटी ने दी मुखाग्नि
सृष्टि न्यूज झारखंड
सृष्टि न्यूज झारखंड गुमला: समाज में आज भी यह धारणा घर कर गई है कि वंश चलाने और अंतिम संस्कार की रस्मों के लिए पुत्र का होना अनिवार्य है। लेकिन गुमला की पांच बेटियों ने इस संकीर्ण सोच को किनारे रखकर समाज के सामने साहस और प्रेम की एक नई मिसाल पेश की है।
सादगी और संघर्ष का हुआ अंत
गुमला शहर के डीएसपी रोड निवासी कौशल्या देवी (76 वर्ष), जो प्रख्यात अधिवक्ता स्व. कमासुख ओहदार की धर्मपत्नी थीं, का सोमवार 23 मार्च को निधन हो गया। कौशल्या देवी का जीवन सादगी और परिवार के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक था। उनके निधन की खबर से पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।
कौशल्या देवी का कोई पुत्र नहीं था, लेकिन उनकी पांचों बेटियां—नीलिमा, विद्या, ज्योति, अर्चना और अल्पना—हमेशा उनका संबल बनी रहीं। मंगलवार को जब अंतिम विदाई की घड़ी आई, तो इन पांचों बहनों ने अपनी मां की अर्थी को कंधा दिया। श्मशान घाट पर बड़ी बेटी नीलिमा ओहदार ने पूरे विधि-विधान के साथ अपनी मां को मुखाग्नि दी।
यह दृश्य वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखों को नम कर गया। समाज को यह संदेश मिला कि बेटियां न केवल घर की रौनक हैं, बल्कि वे हर उस जिम्मेदारी को निभाने में सक्षम हैं जो पारंपरिक रूप से बेटों के लिए आरक्षित मानी जाती रही हैं।
पहले पिता, अब मां: दूसरी बार पेश की मिसाल
उल्लेखनीय है कि यह पहली बार नहीं है जब इन बहनों ने साहस का परिचय दिया हो। इससे पहले अपने पिता स्व. कमासुख ओहदार के निधन पर भी इन बेटियों ने ही उनकी अर्थी को कंधा देकर अंतिम विदाई दी थी। यह साहसिक कदम गुमला और आसपास के समाज के लिए एक बड़ा संदेश है कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं हैं।
.jpg)
