टैक्स में हिंदुस्तानी, वोट में हिन्दू-मुस्लिम और योजनाओं में जाति—आखिर कब बदलेगी सोच
सृष्टि न्यूज झारखंड / नंदन कुमार
सृष्टि न्यूज झारखंड:- हमारे देश की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था की एक अलग ही विडंबना देखने को मिलती है। जब सरकार को टैक्स देना होता है, तब हम सभी सिर्फ हिंदुस्तानी होते हैं। चाहे व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति या समुदाय से आता हो, देश की अर्थव्यवस्था में उसका योगदान एक नागरिक के रूप में लिया जाता है।
लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब चुनाव का समय आता है। वोट मांगने के दौरान कई बार नागरिक की पहचान उसके विकास, शिक्षा और रोजगार से नहीं, बल्कि हिन्दू, मुस्लिम, जाति और समुदाय के आधार पर तय होने लगती है। राजनीतिक समीकरणों में जनता को अलग-अलग वर्गों में बांटने की कोशिश दिखाई देती है।
वहीं जब किसी सरकारी योजना का लाभ लेने की बात आती है, तो हमारी पहचान SC, ST, OBC, EWS या General जैसे वर्गों में हो जाती है। यानी टैक्स देते समय हम हिंदुस्तानी हैं, वोट देते समय हमारी धार्मिक और जातीय पहचान सामने आ जाती है और सरकारी योजनाओं में हमारी पहचान एक श्रेणी बन जाती है।
सवाल यह है कि आखिर एक आम नागरिक की पहचान क्या होनी चाहिए?
क्या हम सिर्फ चुनाव के समय हिन्दू-मुस्लिम, जाति और समुदाय हैं? या फिर हम सबसे पहले इस देश के नागरिक हैं?
राजनीति में सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं को समझना जरूरी है, लेकिन जनता को बांटकर राजनीति करना लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। नेताओं से सवाल पूछना और अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को समझना भी जनता की जिम्मेदारी है।
देश तभी मजबूत होगा, जब नागरिक की पहचान सिर्फ चुनावी आंकड़ा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार हिंदुस्तानी के रूप में होगी।
अब फैसला जनता को करना है—हम बंटकर राजनीति का हिस्सा बनेंगे या एकजुट होकर विकास की राजनीति की मांग करेंगे ?
